मंत्रीमंडल का फैसला चुनाव पूर्व डेमेज कंट्रोल का रणनीतिक प्रयास - प्रो० डॉ० अरुण कुमार
नियोजित शिक्षकों के संबंध में बिहार मंत्रीमंडल का फैसला उनके गुस्से पर पानी डालने और चुनाव पूर्व डैमेज कंट्रोल का एक सरकारी रणनीतिक प्रयास है। जिस तरह से सरकारी तंत्र इसे "सुविधाओं की वर्षा" जैसे लुभावने शब्दों का प्रयोग कर नियोजित तरीके से प्रचार में व्यस्त हैं, वह सच्चाई कम और भ्रामक ज्यादा है। जो भी थोड़ी बहुत राहत की बात इपीएफ, स्थानांतरण, प्रोन्नति, अवकाश आदि में की गई है, वह शिक्षकों की एकता और संघर्ष तथा न्यायालय के आदेशों का परिणाम है। सबसे ज्यादा हास्यास्पद तो यह है कि 15% वेतन वृद्धि का फैसला आगामी 01-04-2021 से देने का निर्णय है। क्या इसकी गारंटी है कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद यही सरकार रहेगी ? इपीएफ का लाभ सभी शिक्षकों को एक साल की सेवा पूरी करने के बाद से ही मिलनी चाहिए थी। इसे पूर्व के प्रभाव से लागू नहीं करके 01 सितम्बर, 2020 के प्रभाव से लागू किया गया है। स्थानांतरण की सुविधा महिलाओं, दिव्यांगों तथा म्यूच्यूअल ट्रांसफर की सुविधा पुस्तकालाध्यक्ष को देना सवालों के घेरे में है। प्रोन्नति के संबंध में अभी नियमावली बनना बाकी है। यदि चुनाव आचार संहिता के पूर्व नहीं हुआ तो यह फैसला भी अधर में लटक जायेगा।
आज यहाँ जारी प्रेस बयान में अखिल भारतीय विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक महासंघ के महासचिव सह दरभंगा विधान परिषद् शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के प्रत्याशी प्रो(डॉ )अरुण कुमार ने मंत्रीमंडल के फैसलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि लम्बी हड़ताल के दौरान शिक्षकों की जो मूल माँगे थीं, उसकी सरकार ने पूरी तरह अनदेखी की है। ग्राम पंचायत और जिला परिषद के शिकंजे से मुक्त कर सरकारी सेवक घोषित करना, स्थायी शिक्षकों की तरह वेतनमान और सेवाशर्तो की माँग की पूरी तरह उपेक्षा की गई है। माध्यमिक शिक्षकों के लिए लेवेल 7 और 8 के वेतनमान, एसीपी आदि मुद्दों को सिरे से नकार दिया गया है। उच्चतर माध्यमिक शिक्षकों को योग्यता आधारित उच्चतर वेतनमान, पदनाम आदि का सरकार के फैसले में जिक्र न होना चिंता का विषय है।
प्रो० कुमार ने कहा है कि सरकार के सारे फैसले शिक्षकों के पक्ष में कम और चुनावी स्टंट ज्यादा हैं। सभी फैसले इस प्रकार प्रायोजित हैं कि शिक्षकों को महसूस हो कि सुशासन बाबू चुनाव बाद रहेंगे तभी माँगें पूरी होंगी। अब शिक्षकों की बारी है। शिक्षक अपने मान-सम्मान और स्वाभिमान से समझौता नहीं करेंगे, न ही किसी सरकारी भ्रमजाल का शिकार होगें। वे अपनी एकता और संघर्ष के बल पर अपनी माँगो को लेकर रहेंगे। आगामी चुनाव शिक्षकों के लिए लिटमस टेस्ट होगा।