शायद उचित हो ये परिवर्तन.....डॉ० क्षितीश भूषण पाण्डेय


अपने बी.एड.( बैचलर ऑफ एजुकेशन) की पढाई के दौरान हमें कई शिक्षाविदों के विचारों को पढ़ने का मौका मिला था। एक बात तब मुझे अच्छी लगती थी कि लगभग सभी शिक्षाविदों का मानना था कि प्राइमरी की पढ़ाई मातृभाषा में होनी चाहिए.. तर्क ये था कि बच्चे स्कूल जाने के पूर्व से ही जिस भाषा से परिचित होते हैं वो है मातृभाषा। अतः प्राइमरी स्तर पर पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा होने से बच्चों में सीखने की प्रवृत्ति स्वाभाविक और तीव्र होती है। नई शिक्षा नीति 2020 के प्रारूप में ऐसा देखकर अच्छा लगा कि ये कॉन्सेप्ट आज के शिक्षाविदों को भी स्वीकार्य है.. साथ ही एक सवाल मेरे मन में उत्पन्न हुआ कि क्या प्राइवेट स्कूल इसे स्वीकार करेंगे...! ख़ैर ये बाद की बात है कि नई शिक्षा नीति का ये कॉन्सेप्ट प्राइवेट स्कूलों में कितना प्रभावी होगा.. लागू हो जाये तो निःसन्देह बेहतर..। अभी इस विषय पर ज्यादा सर खपाने का कोई मतलब नहीं..। परंतु आज की परिस्थितियों पर हम बात करें तो...बच्चों की पढ़ाई को लेकर एक निम्न मध्यवर्ग भी प्राइवेट स्कूल की ओर भागता है और बस भागता ही रहता है..!! 


ज़्यादातर स्कूलों की टाइमिंग सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे की होती हैं। अब प्राइमरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों के लिए इस टाइमिंग के प्रतिफल की ओर चलते हैं... सुबह आठ बजे से स्कूल पहुँचना हैं तो सुबह 6.30 बजे स्कूल बस आपके घर के निकट वाले स्टॉप पर आएगी, सुबह 6.30 बजे आपको बस स्टॉप पर अपने बच्चे के साथ खड़ा रहना है नहीं तो बस छूट जाएगी। सुबह 6.30 बजे बस स्टॉप पहुँचने के लिए पूर्व की तैयारी हेतु प्रातःकालीन कार्यक्रम और दिनचर्या क्या होगी..! बच्चे की माँ सुबह पांच बजे अपने आप से घनघोर लड़ाई करते हुए घड़ी के अलार्म के सहारे उठते ही किचेन में प्रवेश करती है। रात का गुथा हुआ आटा और कटी हुई सब्जियां फ़्रीज की ठंढी तासीर से बाहर निकाल ली जाती हैं और बच्चे के स्कूल ले जाने हेतु लंच की तैयारी शुरू...दौड़ कर कभी बच्चे के स्कूल-बैग को तैयार करना तो कभी किचेन में लंच की तैयारी... हां, हर गतिविधि के बीच बच्चे और उसके पिता को एक चेतावनी... अभी तक उठे नहीं...जल्दी उठो नहीं तो आज फिर बस छुट जाएगी....!! ख़ैर भागम-भाग के बीच बच्चे को किसी तरह से तैयार करते हुए उसके मुँह में दूध ग्लास ढकेल दिया जाता है और पीठ पर बैग, गले में वाटर बोतल और हाँथ में लंच बॉक्स लटका दिया जाता है। पुनः मुँह में दो बिस्कुट ठूंसते हुए बच्चा, पिता के साथ बस की ओर दौड़ पड़ता है। शहर भर की धूल और ट्रैफिक जाम के बीच बच्चे कभी समय पर तो कभी विलंब से स्कूल पहुंच जाते हैं। दो बजे तक तथाकथित विद्या धन प्राप्त कर बच्चे मध्य दोपहर में बस पर पुनः सवार होकर घर की ओर चलते हैं। फिर से शहर भर की धूल, चिलचिलाती गर्मी के बीच ट्रैफिक जाम को झेलते हुए कभी चार बजे तो कभी भगवान भरोसे घर पहुँचते हैं। खेलने के समय पर थक कर सो जाना और फ़िर ऑनलाइन गेम या मोबाइल के सहारे अपने को रिफ़्रेश करना, रात में सोने से पहले होमेवर्क पूरा  करना... मानो आज के बच्चों की नियति हो गई है..!! शायद आज के बच्चों से अधिक भाग्यशाली हमारा बचपन था। कृपा भई.. इस कोरोना की जो इन नन्हें तन-मन को थोड़ा शुकुन तो मिला ...!! लेकिन स्थिति सामान्य होने पर पुनः वही दिनचर्या होगी और सवाल जिंदा ही रहेगा कि क्या आज हम अपने जिगर के टुकड़ों साथ कुछ गलत तो नहीं कर रहे हैं ? आज के परिवेश में स्थायी रूप से एक परिवर्तन की ओर मेरा ध्यान जाता है कि प्री प्राइमरी और प्राइमरी के कक्षाओं का संचालन सप्ताह में तीन दिन से अधिक न हो। तीन दिन क्लास-वर्क और तीन दिन होम-वर्क..। वैसे भी फूलों को खिलने के लिए धूप और छाँव दोनों जरूरी है..! यदि पाठ्यक्रम से अनुपयोगी और औचित्यहीन तथ्यों को कम कर दिया जाए तो ऐसा करना अव्यहारिक न होगा। ऐसा प्रयोग सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में भी उपयोगी हो सकता है जिससे आज सरकार के सामने छात्र-शिक्षक अनुपात की समस्या में पूर्णतः नहीं तो आंशिक सुधार निश्चित दिखेगा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का रास्ता भी खुलेगा।.... ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं जो अक़्सर ट्रैफ़िक जाम में फसे स्कूल बसों में गर्मी से उबलते निर्दोष चेहरों को देखकर मन में उत्पन्न होते हैं।
       

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