विकासबाबू यह शिक्षा का विकास है या विनाश ?
5 साल में कभी भी ग्रीष्मावकाश की खाद्यान राशि बच्चों के खाते में नहीं जाती थी, लेकिन इस चुनावी मौसम में सरकार का आदेश है कि गर्मी के छुट्टी का भी पैसा या चावल देना है।
जब पंचायत में सब घर को राशन कार्ड से केंद्र सरकार 5 किलो चावल दे ही रही है तो फिर भी माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी का आदेश है कि इसके अलावा स्कूल के बच्चों के अभिभावक थैला लेकर स्कूल आएंगे और मास्टर साहब उनको कार्य दिवस जोड़ कर चावल नाप कर देंगे और खाताबही की खानापूर्ति करेंगें। जब DBT के माध्यम से राशि जा सकती है तो डायरेक्ट उनके खाते पर ही भेज दें। ये भीड़ जमा कर नौटंकी करके VOTE जुटाने की क्या जरूरत है ?
पोशाक या छात्रवृत्ति राशि 5 साल तक सिर्फ 75% उपस्थिति के आधार पर ही दी जाती थी। किन्तु चुनावी मौसम में अचानक 100% को देना अनिवार्य हो जाता है।
अंडा दो, पोशाक दो, छात्रवृत्ति दो, मिड डे मील का खाना नहीं बल्कि पैसा दो। उनके खाते में लेकिन शिक्षा देने का कोई प्रावधान नहीं, स्कूल का नाम बदल कर 'सामुदायिक मुख्यमंत्री राशि बँटवारा केंद्र' ही रख दें तो क्या आपत्ति है ?
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क्या सरकार ने कभी कोई कमिटि बनाई है जिसमें सरकार अन्य राज्य जैसे- दिल्ली, छत्तीसगढ़, कर्नाटक या फिर अन्य देश जैसे- स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड के विद्यालयों का केस स्टडी करें, उनके शिक्षा मॉडल को समझे और फिर बिहार में भी वैसा शिक्षा मॉडल लागू करने की घोषणा करें ? शायद कभी नहीं, 15 साल में एक कमिटि नहीं बनी जो बेहतर शिक्षा मॉडल लागू करने पर रिसर्च कर सके।
क्या यही शिक्षा का विकास है ? अगर नहीं तो क्यों ?